Legal situation:
India inherited the sodomy law called Section 377 of the Indian Penal Code from the British. It was a law that was intended to criminalise ‘sodomy’ or the act of anal sex. Over time, judicial pronouncements extended the scope of the law to other sex acts like oral sex and mutual masturbation. There are very few prosecutions, but because it was a non-bailable and cognizable offence, it has and is widely abused by law enforcement agencies for extortion, blackmail, and sexual abuse.

The law was challenged in the Delhi High Court, and by a judgment passed in July 2009 the Delhi High Court ruled that the law violates the constitutional guarantees of life and equality and therefore directed that it can be applied only in coercive and non-consensual situations. Thus homosexuality was effectively de-criminalized in India. Thereafter religious and right wing groups challenged the judgment in the Supreme Court of India, which overturned the judgment by a decision passed in December 2013. Homosexuality became a crime in India again. However, the Supreme Court has agreed to re-hear the whole matter again before a four-judge bench through a mechanism called a ‘curative petition’.

In the meantime, another two judge bench of the Supreme Court passed a very rights affirming judgment in July 2014, granting transgender persons many privileges, including freedom from discrimination by the state, equal employment and education opportunity, recognition of a 3rd gender different from ‘male’ or ‘female’, reservation in government jobs and in educational institutions, and setting up of transgender welfare boards by states.

The Supreme Court judgment does not merely recognize transgenders as third gender but also recognizes their right to decide their gender as per their self-identification. Thus, under the judgment, a transgender individual may identify as male, female or third gender (NALSA v. Union of India, Para 129)

Social situation: India is socially tolerant in many ways and non-violence is at least officially the cultural creed of Hindus, Jains, Sikhs, and Buddhists (Who together form a majority of the people in India). India is also a shame-based culture where anything that is deemed to be shaming or causing loss of honour is treated with some degree of violence as retribution. Sexual expressions of a public nature are perceived to be shaming.

Those who are incapable of ‘blending in’, therefore are the ones that are most targeted by opprobrium. And leading in this category are male to female (MTF) transpersons, for they are the most visible and therefore most targeted as well. There is a whole saga of documented violence against MTFs.

It may be important to point out that society is not a monolith and while right wing and religious reactionary forces have opposed any advance of LGBT rights and have been to the court seeking re-criminalization (presently successfully), other parts of society has solidly backed LGBT rights. These include professional bodies like groups of academics, psychiatrists, psychologists, historians, left wing civil society organisations, human rights groups, progressive women’s groups, litterateurs and artists, medical professionals, and most importantly the media.

Political situation: India has a relatively stable democracy. Political parties have had reasonable freedom in India. This also allows for political activism to claim rights. LGBT people in India have been able to carve out a political space for themselves in this milieu.

Most parties in India that are on the left side of the scale have consistently supported LGBT rights for over a decade. The Delhi High Court judgment was so well written that the Congress Party was forced to change its stand in view of the same.

The parliamentary elections in 2014 brought the right wing nationalist Indian People’s Party (BJP) to power. The BJP endorses a fundamentalist politics with a clear Hindu majoritarian bias. They oppose any change of Section 377 and have consistently justified their opposition on the grounds that homosexuality is against Indian culture and values. Organised reprisals and pogroms against LGBT activists have also happened under BJP rule in the past.

General LGBTI situation: In light of the above, we can say that the LGBT situation is India is sub optimal in terms of rights and a lot of work needs to be put in to ensure that LGBT rights are secured. There is however a social, political, and legal space and environment that can ensure that this happens and therefore the there is scope for optimism.

Considering the geographical and populous diversity of India, SAHRA has found it practical to operate activities region wise. As such, five different geographical regions have been devised, and they are as follows:
North: Delhi, Chandigarh, Haryana, Himachal Pradesh, Jammu and Kashmir, Punjab, Uttarakhand, and Uttar Pradesh
East: Bihar, Chhattisgarh, Jharkand, Orissa, and West Bengal
West: Goa, Gujarat, Madya Pradesh, Maharastra, and Rajasthan
South: Andra Pradesh, Karnataka, Kerala, Telangana and Tamil Nadu
Northeast: Arunachal Pradesh, Assam, Manipur, Meghalaya, Mizoram, Nagaland, Sikkim, and Tripura.


Current Activities

SAHRA’s Indian partners currently document human rights violations of LGBT persons, and run documentation training and human rights awareness classes. For further information, please contact SAHRA India via e-mail, depending on the region to where you belong.


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साहरा भारत

कानूनी स्थिति:

भारत को अंग्रेजों से विरासत में गुदामैथुन विरोधी कानून भारतीय दंड संहिता की धारा 377 मिला है। यह गुदामैथुन या ‘anal sex’ को अपराधीकरण के दायरे में लाने के इरादे से बनाया गया एक कानून था। समय के साथ, न्यायिक घोषणाओं के द्वारा न्यायालयों ने इस कानून के दायरे को बड़ा कर इस में मौखिक सेक्स और आपसी हस्तमैथुन जैसे अन्य यौन कृत्य भी सम्मिलित कर दिया। इस कानून का मुकद्दमों में ज्यादा प्रयोग नहीं हुआ है, लेकिन यह एक गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध है, इस लिए इस का व्यापक रूप से जबरन वसूली, ब्लैकमेल, और यौन शोषण के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा गलत व्यवहार किया जाता है।

इस कानून को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी, और जुलाई 2009 में पारित एक फैसले से दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया के यह कानून जीवन और समानता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करता है। न्यायलय ने यह निर्णय सुनाया के केवल आक्रामक और गैर सहमति स्थितियों में ही इस कानून को लागू किया जा सकता है। न्यायलय के इस निर्णय के साथ ही समलैंगिकता को प्रभावी ढंग से भारत में अपराधीकरण के दायरे से निकाल दिया गया था। इसके बाद धार्मिक और दक्षिणपंथी समूहों ने उच्चतम न्यायलय में अपील दायर कर दिया और मांग करी के दिल्ली उच्च न्यायलय के फैसले को पलट दिया जाये। उच्चतम न्यायलय ने इन अपीलों को स्वीकारते हुए दिल्ली उच्च न्यायलय के निर्णय को दिसंबर 2013 में पलट दिया और धरा 377 को फिर से लागू कर दिया। उच्चतम न्यायलय के इस निर्णय का पुरजोर निन्दा विश्व भर में हुआ, और अंततः न्यायलय ‘उपचारात्मक याचिका’ नामक एक तंत्र के माध्यम से एक चार सदस्यीय पीठ के समक्ष पूरे मामले को फिर से सुनने के लिए सहमत हो गया है।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के एक और दो जजों की खंड पीठ ने मौलिक अधिकारों को सुदृढ़ करने वाली जुलाई 2014 की एक निर्णय में ट्रांसजेंडर लोगों को कई सारे अधिकार दिए। इन अधिकारों में राज्य द्वारा भेदभाव से मुक्ति, समान रोजगार और शिक्षा के अवसर, ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ से अलग एक तीसरे लिंग की मान्यता सहित कई विशेषाधिकार, सरकारी नौकरियों में और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण, और राज्य द्वारा ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की स्थापना करने का निर्देश मुख्या है। सुप्रीम कोर्ट यह फैसला ट्रांसजेंडरों को महज तीसरे लिंग के रूप में पहचान ही नहीं बल्कि उनके आत्म-पहचान के के आधार पर उनके स्वयं के लिंग को तय करने के उनके अधिकार को भी मान्यता देती है। यानि कोई भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति पुरुष, महिला, या तीसरे लिंग, के रूप में अपनी इच्छा से अपना पहचान करा सकते हैं (नालसा वी. भारत संघ, पैरा 129)।

सामाजिक स्थिति:

भारत कई मायनों में सामाजिक रूप से सहिष्णु है और हिन्द, जैनों, सिक्खों, और बौद्धों (जो सम्मिलित रूप से भारत में बहुसंख्यक हैं) का सांस्कृतिक पंथ कम से कम आधिकारिक तौर पर अहिम्स है! भारत की संस्कृति में, शर्म या सम्मान की हानि के धारणा पर आधारित मानसिकता से समाज में अधिकतर लोग चलित होते हैं, और सम्मान की हानि होने पर हानि करने वाले के विरुद्ध हिम्सा करना जायज़ माना जाता है। एक सार्वजनिक रूप से यौन अभिव्यक्ति को सम्मान की हानि करने वाला चीज़ माना जाता है।

इसी कारणवश जो लोग समाज के योन नियमों के अनुरूप आचरण नहीं करते या जो खुले तौर पर अपने यौनिकता को अभिव्यक्त करते हैं, उन लोगों के विरुद्ध अक्सर हिम्सा की जाती है। और इस श्रेणी में सब से आगे हैं पुरुषों से महिलाओं में रूपांतरित ट्रांसजेंडर व्यक्ति, क्योंकि वे वाह्य जगत में सबसे ज्यादा नज़र में आ जाते हैं इस कारन उन्हें हिम्सा द्वारा लक्षित करना सब से आसान होता है। ऐसे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ प्रलेखित हिम्सा की एक पूरी गाथा है।

भारत का समाज कोई एकाकी पाषाण खंड नहीं है, और इस में जहाँ एक तरफ धार्मिक कट्टरपंथी और दक्षिणपंती ताकतों ने समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर के अधिकारों में हुए हर तरक्की का विरोध किया है, और वर्तमान में सफल तौर पर पुनर- अपराधीकरण के अपने इरादे को उच्चतम न्यायलय की मदद से परिपूर्ण किया है, वहीँ समाज के कई अन्य अंगों ने समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर अधिकारों को मजबूत समर्थन भी दिया है। इन समर्थकों में पेशेवर शिक्षाविदों, मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों, इतिहासकारों, वामपंथी नागरिक समाज संगठनों, मानवाधिकार संगठनों, प्रगतिशील महिला समूह, साहित्यकारों और कलाकारों, चिकित्सा पेशेवरों के समूह जैसे निकायों, और सबसे महत्वपूर्ण मीडिया शामिल हैं।

राजनैतिक स्थिति:

भारत एक अपेक्षाकृत स्थिर लोकतंत्र है। राजनीतिक दलों को भारत में उचित स्वतंत्रता है। राजनैतिक सक्रियता से अधिकारों का दावा करने के लिए यह उचित वातावरण उपलब्ध कराता है। भारत के इस राजनैतिक परिवेश में खुद के लिए एक राजनीतिक अंतरिक्ष उत्कीर्ण करने में समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर लोग सक्षम रहे है।

वामपंथी राजनैतिक गुठों ने एक दशक से अधिक समय से लगातार समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर अधिकारों का समर्थन किया है। ३७७ को रद्द करने वाला दिल्ली उच्च न्यायलय का निर्णय इतने निपुण तरीके से लिखा गया था के उस के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने भी अपने पहले के नीतियों को बदल कर अब समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर अधिकारों का समर्थन करना प्रारम्भ किया है।

2014 के संसदीय चुनावों के पश्चात दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आ गयी है। भाजपा एक स्पष्ट हिंदू बहुसंख्यकवाद पूर्वाग्रह के साथ एक कट्टरपंथी राजनीति का समर्थन करता है। वे धारा 377 के किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं और लगातार पैरवी करते हैं की उन का यह विरोध जायज है क्योंकि वे मानते हैं की समलैंगिकता भारतीय संस्कृति और मूल्यों के खिलाफ है। समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए कार्यरत कार्यकर्ताओं के खिलाफ संगठित हिम्सा भी अतीत में भाजपा शासन के तहत हुआ है।

समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर की साधारण स्थिति:

ऊपर दिए तथ्यों के प्रकाश में, हम समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर अधिकारों के मामले में उन की भारत में स्थिति को उप इष्टतम कह सकते हैं और इन अधिकारों को सुरक्षित और सुदृढ़ करने के लिए अभी बहुत काम करने की आवश्यकता है। इस के बावजूद हम आशावाद हो सकते हैं क्योंकि भारत की व्यवस्था के सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी अंतरिक्ष में अधिकारों की पैरवी करने का पर्यावरण स्थापित करना संभव है। भारत की भौगोलिक और अधिक जनसंख्या वाले विविधता को देखते हुए SAHRA को ऐसा लगा है की भारत में व्यवहारिक तौर पर छेत्रों के विभाजन में काम करना प्रभावी होगा। इस कारन भारत को पांच भौगोलिक छेत्रों में विभाजित किया गया है जो इस प्रकार हैं:

उत्तर: दिल्ली, चंडीगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश।

पूर्व:बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल।

पश्चिम: गोवा, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान।

दक्षिण: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु।

पूर्वोत्तर: अरूणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, और त्रिपुरा।


हाल की गतिविधियों

SAHRA के भारतीय भागिदार वर्तमान में समलैंगिक और ट्रांसजेंडर के अधिकारों के उल्लंघन के घटनाओं का प्रलेखन करते हैं, और प्रलेखन विधि प्रशिक्षण और मानव अधिकारों के प्रति जागरूकता की कक्षाएं चलाते हैं। अधिक जानकारी के लिए आप अपने छेत्र के भारीतय SAHRA से ईमेल द्वारा संपर्क करें।


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